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Q| भारत की वर्तमान विदेश नीति और चुनौतियों का वर्णन कीजिए|

    पृष्ठभूमि:


    BPSC Mains Sample Ans Hindi 1


    उत्तर-
    वर्तमान में भारत की स्थिति विश्व में एक मजबूत  देश के रूप में उभरी है| आर्थिक मंच पर हो या सांस्कृतिक प्रत्येक क्षेत्र में अपनी छवि विश्व स्तर पर भी सराहनीय  बना रहे हैं| अपने विदेश नीति के तहत हम किसी भी देश को बिना नुकसान पहुंचाए |अपनी स्थिति को सुंदर बनाने में काफी हद तक सफल हुए हैं| इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हाल में ही आर्थिक मंच पर आर्थिक रूप से  सुदृढ़ देशों में छठा स्थान हमने पाया है|

       दुनिया के प्रत्येक देश के सामने एक सुव्यवस्थित बाजार के रूप में हम उभर कर आए हैं| जहां एक  कुशल राजनीति, आर्थिक और सुरक्षित परिवेश का समावेश है| यहां निवेश करना और अवसर तलाशना काफी आसान होता जा रहा है, यह हमारे बदलते विदेश नीति का परिणाम ही है|

                  एक तरफ जहां हम मैत्री संबंध और  सहजता के लिए पूरे विश्व में पहचाने जाते हैं वहीं पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के साथ कड़ा रुख अपनाने के कारण एक शक्ति के रूप में भी उभर कर आ रहे हैं|

    भारत की नई विदेश नीति के संदर्भ में कुछ तथ्य:

    • पाकिस्तान के साथ पैदा हुए तनाव के बाद भारत के द्वारा तैयार किया गया कड़ा रुख|
    • भारत की कुशल नीति के कारण भारत द्वारा उठाए कदम का रूस और अमेरिका समेत कई देशों का समर्थन|
    • 2014 में गठित सरकार पहले ही साल में अपने पड़ोसी देशों के साथ- साथ एशिया के सभी देशों के साथ नजदीकियां बढ़ा कर ,अपनी विदेश नीति का बदलता स्वरूप प्रस्तुत किया|
    • भारत की मौजूदा सरकार ने अमेरिका जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर चतुष्कोण  सुरक्षा संवाद बढ़ाया| जो एक बेहतरीन विदेश नीति का परिचय था|
    • भारत की दक्षिण पूर्व एशिया “लुक ईस्ट नीति “को “एक्ट ईस्ट नीति” में बदल दिया। ऐसे में भारत का 2018 के गणतंत्र दिवस परेड व समारोह के लिए पर पहली बार दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान) के सदस्यों- ब्रूनेई, इंडोनेशिया, कंबोडिया, मलेशिया, लाओ पीडीआर, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाइलैंड और वियतनाम देशों के प्रमुखों को भारत की ओर से आमंत्रित किया जाना एक मास्टरस्ट्रोक कहा जा सकता है |
    • आज “डोकलाम विवाद ” पर भारत का कड़ा रुख भी भारत की नयी विदेश निति को दर्शाती है कि अब ना तो भारत कमज़ोर राष्ट्र है और ना ही भारत का नेतृत्व अक्षम और दुर्बल हाथो में है। आज स्थितियां बदल चुकी है। पहले चीन भारतीय भूभाग में अनधिकृत प्रवेश करता रहता था और आज चीन पुरे विश्व में समर्थन की अपेक्षा से स्वयं ही स्वीकार कर रहा है कि भारतीय सेना चीन के भूभाग में प्रवेश कर चुकी है और वापिस नहीं जा रही है।डोकलाम क्षेत्र में त्रिपक्षीय सीमा विवाद में ज्‍यादातर देश भारत के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं।
    • भारतीय विदेशनीति की सफलता नहीं मानेगे की उसने एक तरफ जहा अपने सम्बन्ध अमेरिका के साथ अच्छे किये हैं वही उसने अपने पुराने सहयोगी रूस को भी अपने से अलग नहीं होने दिया हैं। किसी एक राष्ट्र की कीमत पर दूसरे राष्ट्र के साथ सम्बन्धो का बलिदान नहीं किया हैं। और शायद यही करण भी हैं कि इजरायल और आयरलैंड की यात्राये वर्तमान सरकार की इस नीति का एक और उदाहरण हैं।
    • आज भारत में विदेश नीति में स्टैंड बाय की तरह नहीं बल्कि एक्टिव मोड में आ चुका है|
    • जहां एक  एक तरफ हम अपनी संस्कृति और विरासत को पूरी दुनिया को बताना चाहते हैं वहीं दूसरी ओर हम पूरी दुनिया से सीखने को भी तैयार है|
    • 34 साल की बात किसी भारतीय प्रधानमंत्री का यूएई का दौरा और साथ ही साथ पहली बार फिलिस्तीन का अधिकारिक दौरा हमारी बदलती विदेश नीति की कुशलता को बखूबी दर्शा रहा है|
    • हमारे प्रधानमंत्री का विश्व के विकसित देशों के साथ साथ भूटान और  मालदीव देशों के साथ संबंध सुंदर करना अपने आसपास क्षेत्र में मजबूती और सहयोग की नीति के तहत एक कुशल सोच का परिणाम दिखती है|


    अपने बदलते विदेश नीति के कारण भारतीय समाज में आए बदलाव की चर्चा:

    • लगातार बदलती विदेश नीति का परिणाम हमारे भारतीय समाज में अक्सर देखा जा रहा है|
    • जहां एक और हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी होती जा रही है ,वहीं दूसरी ओर सांस्कृतिक और शैक्षिक योग्यता का भी समावेश हो रहा है|
    • विश्व में हमारी एक पहचान बनकर उभर रही है| निवेशक निवेश को तैयार हो रहे हैं|
    • एक सुरक्षित और  सुदृढ़ राजनीति हमारे कमजोर होने की सोच को खत्म कर रहा है|
    • आज पूरे  दुनिया में  सिर्फ कर्ज लेने वाले देश के रूप में नहीं बल्कि आर्थिक मदद करने वाले देश के रूप में भी पहचाने जा रहे हैं|
    • हमारी विदेश नीति का बदलता स्वरूप ही परिणाम था हाल में ही इस्लामिक सहयोग संगठन में पहली बार भारत का  आमंत्रण|
    • अमेरिका ,रूस ,जापान यहां तक कि चीन कभी हमारे  हमारे प्रति बदलता रुख हमारी सफलता को दर्शाता है|
    • आज हम आतंकवाद के खिलाफ जिस तरह से अपनी बात रखना चाहते हैं, और परिस्थितियों को बदलने की कोशिश कर रहे हैं उसने पूरा विश्व हमारा समर्थन कर रहा है यह हमारी बदलती विदेश नीतियों का परिणाम है|

          

    इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हमारी नई विदेश नीति हमें वैश्विक स्तर पर एक मजबूत  स्थिति मे ला रही है किंतु यह हमारे लिए शुरूआत होनी चाहिए| हमें अभी भी बहुत सारे वैश्विक मंच में अपनी स्थिति को मजबूत बनाना है| कुछ देश आज भी हमारी स्थिति को वैश्विक स्तर पर कमजोर बना देते हैं| हमें उन देशों को अपनी कूटनीति और कुशलता का परिचय देना होगा| हमें और भी अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करनी होगी |विदेश नीति ऐसी होनी चाहिए कि हमें भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता, एनएसजी की सदस्यता और एमटीसीआर की सदस्यता भी मिल सके, यह हमारे विदेश नीति के लिए एक चुनौती बनकर उभर रहा है|

           

    जिस प्रकार हमने बांग्लादेश  के साथ अपने विदेश नीति का उत्तम परिचय दिया उसी प्रकार हमें हमारे अन्य पड़ोसियों को भी एक मैत्री सूत्रपात में बांधना होगा| आतंकवाद जैसी समस्याओं से निपटने के लिए हमें अपनी स्थिति और भी मजबूत करनी होगी अपने देश की सुरक्षा और शांति को बनाए रखने के लिए हमें अपने सुरक्षाबलों को और भी मजबूत और निपुण बनाना होगा|


    इन सभी प्रयासों के साथ साथ सर्वप्रथम हमें अपनी आर्थिक और शैक्षिक योग्यता को हर हाल में निपुण करना होगा| इसके साथ साथ पर्यटन और अवसर की सुविधा उपलब्ध करानी होगी| ताकि हम अन्य देशों के साथ खड़े हो सके| अपनी विदेश नीति में हमें तकनीकों और नई विज्ञान रिसर्च  को तहे दिल से स्वीकार करना होगा, हमें भी अन्य देशों की तरह विकास की हर सीढ़ी को चढ़ने के लिए तैयार होना पड़ेगा| कुशल और स्वस्थ भारत ही वैश्विक स्तर पर खड़ा रह सकता है, यह हम कभी नहीं भूल सकते|


    भारतीय विदेश नीति के सामने आने वाली चुनौतियां-

    • हमारे पड़ोसी देशों का अनैतिक व्यवहार
    • आंतरिक राजनीति के कारण आती  अड़चन
    • आर्थिक स्थिति से मजबूत देशों का अपना अपना स्वार्थ
    • आतंकवाद
    • आंतरिक सुरक्षा और सद्भावना  बिगड़ने का डर|

    भू-राजनीति तथा घरेलू दबावों में परिवर्तन होने के कारण विदेश नीतियां भी परिवर्तनशील होती हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने “इंडिया फर्स्ट” को सारगर्भित तरीके से विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य बना दिया और अपने शपथ ग्रहण समारोह में दक्षेस नेताओं को न्योता देकर “पड़ोस” को प्राथमिकता देते हुए संपर्क आरंभ किया, जिसे कई पर्यवेक्षकों ने उत्कृष्ट और असाधारण लेकिन आवश्यक शुरुआत का नाम दिया।

               क्षेत्रीय तथा वैश्विक मामलों में और अधिक प्रभाव डालने की कोशिश कर रहे भारत जैसे देश के लिए अहम है कि उसे पड़ोसी देशों से सहयोग मिलता रहे। कोई और रास्ता ही नहीं है क्योंकि कोई भी अपने पड़ोसी चुन नहीं सकता, वे तो भूगोल तथा इतिहास से उसे मिलते हैं। हमारे मामले में आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले पाकिस्तान के अड़ियल रवैये के बावजूद प्रयास जारी रहने चाहिए।चीन भी हर मुश्किल में पाकिस्तान दोस्त बना रहा है और वैश्विक चिंताओं को नजरअंदाजा कर हर परिस्थिति में पाकिस्तान का साथ निभाता रहा है। हमारे अन्य पड़ोसी भी अक्सर क्षेत्रीय ताकतों विशेषकर चीन से अधिक से अधिक लाभ लेने के लिए दांव खेलते रहते हैं। उनके राष्ट्रीय हितों के लिहाज से देखा जाए तो ऐसी अस्थिर कूटनीति समझ में आती है, लेकिन इसके फेर में हमारी सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हितों से समझौता हो जाता है। इस उपक्षेत्र में भारत को दबाकर रखने अथवा नीचा दिखाने की इच्छा वाली किसी प्रमुख शक्ति से शह पाए बगैर क्या हमारा कोई भी पड़ोसी इस तरह अवज्ञा कर सकता है।


          विदेश नीति के मामले में भारत की सबसे बड़ी चुनौती केवल यह नहीं होगी कि अपने पड़ोसियों तथा आसियान एवं पश्चिम एशिया समेत दूरवर्ती पड़ोसियों को किस तरह संभाला जाए बल्कि विश्व की प्रमुख शक्तियों के साथ अपने संबंधों को दुरुस्त करना भी चुनौती होगी क्योंकि वे शक्तियां अपना-अपना प्रभाव जमाने के लिए होड़ करती रहती हैं तथा किसी न किसी के जरिये यह काम करना चाहती हैं जबकि इतने बड़े आकार, आर्थिक एवं सैन्य शक्ति, मानव संसाधन तथा रणनीतिक लाभ के कारण भारत ऐसी भूमिका में नहीं आ सकता। ऐसी परिस्थितियों में कोई अपने सिर पर मंडराते सायों से छुटकारा कैसे पाए?

               जहां तक चीन-भारत संबंध हैं तो प्रत्यक्ष तौर पर सब कुछ ‘सहयोग-प्रतिस्पर्द्धा’ का नमूना लग रहा है। लेकिन चीन मौके की ताक में भारत की तरफ देख रहा है और रूस जैसे भारत के पारंपरिक साझेदारों को दूर ले जाने की कोशिश भी कर रहा है। रणनीतिक वैश्विक मंच पर जगह पाने के भारत के दावे का चीन द्वारा लगातार किया जा रहा विरोध परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में शामिल होने तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता पाने के हमारे प्रयासों को विफल करता रहेगा। चीन-पाकिस्तान-रूस के बीच कुछ समय पहले हुई बैठकें तथा भारतीय सैन्य प्रतिष्ठानों पर आतंकी हमले होने के बावजूद रूस-पाकिस्तान सैन्य अभ्यास इसका उदाहरण हैं।


           रूस के साथ भारत के रिश्ते बहुत पुराने और विविधता भरे हैं, लेकिन अमेरिकी प्रशासन के साथ भारत की बढ़ती निकटता ने रूसियों को प्रकट रूप से तालिबान और अफगानिस्तान के कारण ही सही, पाकिस्तान के साथ रिश्ते बढ़ाने का बहाना दे दिया है। इसके संकेत कम से कम सात-आठ वर्ष से मिल रहे थे। लेकिन क्या अब मामला ऐसी जगह पहुंच गया है, जहां से वापसी नहीं हो सकती। कुछ वर्ष पहले तक यह मान लिया गया था कि रूसी प्रशासन पाकिस्तान की बातों में नहीं आएगा। लेकिन हकीकत यह है कि ऐसा हो चुका है और अब उसका सामना करने और उन्हें अलग करने की जरूरत है। यह भी सच है कि “भरोसेमंद और पुराने दोस्त” या “रूसी-हिंदी भाई भाई” जैसे भावनात्मक जुमलों से स्थिति पहले की तरह नहीं की जा सकती, लेकिन भारत के साथ सख्त आर्थिक रिश्ते उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर सकते हैं क्योंकि खनिजों तथा हीरों के अलावा सैन्य उपकरणों तथा असैन्य परमाणु प्रतिष्ठानों के लिए भारत अब भी उसके सबसे बड़े बाजारों में शामिल है।


       जहां तक अमेरिका की बात है, हालांकि भारत के साथ रणनीतिक रिश्ते और भी मजबूत करने के लिए दोनों पक्षों का समर्थन है, लेकिन ट्रंप प्रशासन की आसक्ति और प्रतिबद्धता ‘कोरे पन्ने’ की तरह यानी पूर्वग्रह रहित है और अमेरिका में भारतीय समुदाय का मजबूत प्रभाव तथा राष्ट्रपति ट्रंप की कारोबारी रुख रखने वाली टीम उसे भारत की ओर केंद्रित रखने में सहायक हो सकती है। रोजगार और विनिर्माण वापस अमेरिका में लाने तथा कर ढांचों में प्रस्तावित बदलावों की नीतियों से भारत में अमेरिकी वित्तीय निवेश में कमी आने की आशंका तो है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को कुछ दिक्कत हो सकती है। यहां एक बार फिर वही बात आती है कि प्रतिस्पर्द्धा भरा तथा दूसरों की तुलना में अधिक फायदे एवं प्रोत्साहन भरा बाजार बने रहना हमारे लिए आवश्यक है और इसके लिए हमें नियमों को पिछली तिथि से लागू करने से बचना होगा क्योंकि इससे विदेशी निवेशकों के मन में शंकाएं उत्पन्न हो गई हैं।

         आतंकवाद विशेषक पाकिस्तान प्रायोजित आंतकी समूहों की ओर से आतंकवाद दशकों से भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा रहा है। संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर समग्र संधि (सीसीआईटी) कराने के भारत के प्रयास प्रमुख देशों की प्रतिबद्धता कम होने के कारण विफल रहे हैं। आईएसआईएस, अलकायदा और उसकी विभिन्न शाखाओं तथा चरमपंथी इस्लामी गुटों के खिलाफ लड़ाई विशेष रूप से पश्चिम एशियाई देशों के साथ खुफिया जानकारी की अधिक साझेदारी तथा सहयोग के जरिये ही करनी होगी और इसके लिए “लुक वेस्ट” नीति को “एक्ट वेस्ट” नीति में बदलना होगा, जिससे पाकिस्तान के साथ उनकी नजदीकी और समर्थन कम हो सकता है।

       चीन जैसे देश स्वयं भी आतंकवाद से पीड़ित होने के बावजूद मसूद अजहर जैसे पाकिस्तानी आतंकवादियों को बचाते रहेंगे और रूस का इरादा पाकिस्तान को आतंकवाद का प्रायोजक देश घोषित करने का नहीं है। इससे भारत विरोधी आतंकी हरकतों को जारी रखने की पाकिस्तान की मंशा और भी मजबूत हो गई है, जिसका सामना करने के लिए व्यापक और सार्थक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन जरूरी हैं।


    निष्कर्ष:

    आज हमारा भारत एक  बदलते स्वरूप में नजर आ रहा है, हम अपनी विदेश नीति में लगातार परिवर्तन कर रहे हैं और हम अधिक शक्तिशाली देश बनकर उभरने का प्रयास भी| हम दुनिया के सभी देशों के साथ सुंदर रिश्ते को निभाने की कोशिश कर रहे हैं और बहुत हद तक हमें सफलता भी पाई है| इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हाल ही में हुए पुलवामा अटैक के बाद दिखाई दिया| लेकिन हमें भी अपनी पुरानी विदेश नीति की स्वर्णिम विचार को बनाए रखना होगा| हम कल भी शांति के प्रतीक ही होंगे| हमें बस अपनी स्थिति को विश्व स्तर पर मजबूत बनाना है और यह मजबूती शांति और सहजता के साथ होगी इसका समावेश हम आज तक करते हैं| आज पूरी दुनिया भारत  की,भारत की नीतियों की कायल है और आगे भी हम उसे कायम रखेंगे|

     

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