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सौर विकिरण
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- पृथ्वी की सतह पर ऊर्जा का प्रमुख स्त्रोत सूर्य है । सूर्य अत्यधिक गर्म , गैस का पिण्ड है । इसके पृष्ठ का तापमान 6000 ° सेल्सियस है । यह गैसीय पिण्ड निरन्तर अन्तरिक्ष में चारों और ऊष्मा का विकिरण करता है जिसे सौर विकिरण कहते है ।
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एल्बिडो Albedo :
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- सूर्य से आने वाली सौर विकिरण की 27 इकाईयाँ बादलों के ऊपरी छोर से तथा 2 इकाईयाँ पृथ्वी के हिमाच्छादित क्षेत्रों द्वारा परावर्तित होकर लौट जाती हैं । सौर विकिरण की इस परावर्तित मात्रा को पृथ्वी का एल्बिडो कहते है । यह परावर्तित मात्रा – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – –
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सौर स्थिरांक :
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- पृथ्वी औसत रूप से वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर 1.94 कैलोरी / प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्रति मिनट ऊर्जा प्राप्त करती है । इसे – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – –
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कैलोरी :
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- एक ग्राम जल के तापमान को एक डिग्री सेल्सियस बढ़ाने के लिए प्रयोग में लाई गई उष्मा को कैलोरी कहते हैं ।
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प्लैंक का नियम :
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- प्लैंक का नियम बताता है कि एक वस्तु जितनी गर्म होगी वह उतनी ज्यादा ऊर्जा का विकिरण करेगी और उसकी तरंगदैर्ध्य उतनी – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – – –
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विशिष्ट उष्मा :
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- एक ग्राम पदार्थ का तापमान एक अंश बढ़ाने के लिए जितनी उष्मा की जरूरत होती है , वह विशिष्ट उष्मा कहलाती है ।
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समताप रेखाएं :
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- मौसम मानचित्र पर खींची जाने वाली काल्पनिक रेखाएं जो एक समान तापमान वाले स्थानों को मिलाती हैं । उन्हें समताप रेखाएं कहते हैं ।
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अपसौर Aphelion :
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- सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के दौरान पृथ्वी 4 जुलाई को सूर्य से सबसे दूर अर्थात 15 करोड़ 20 लाख किलोमीटर दूर होती हैं । पृथ्वी की इस स्थिति को अपसौर कहते है ।
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उपसौर ( Perihelion ) :
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- 3 जनवरी को पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट अर्थात 14 करोड़ 70 लाख किलोमीटर दूर होती है । इस स्थिति को उपसौर कहा जाता है ।
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सूर्यातप :
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- पृथ्वी को सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा को सूर्यातप अथवा आगमी सौर विकिरण कहते हैं । यह पृथ्वी पर – – – – – – – – – – – –
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सूर्यातप तथा तापमान अन्तर स्पष्ट :
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सामान्यतः सूर्यातप व तापमान को पर्यायवाची शब्द समझा जाता है लेकिन इन दोनो शब्दों का भिन्न – भिन्न अर्थ है :
- सूर्यातप :-
- सूर्यातप ऊष्मा है जिससे गर्मी पैदा होती है ।
- यह पृथ्वी को सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है । सूर्यातप को कैलोरी में मापा जाता है ।
- यह 1.94 कैलोरी / प्रति वर्ग सेमी . प्रति मिनट है । गर्मी कारण मात्र है ।
- किसी पदार्थ को गर्मी देने पर उसका तापमान बढ़ता है ।
- तापमान :-
- तापमान ऊष्मा से पैदा हुई गर्मी का माप है ।
- तापमान को थर्मामीटर द्वारा डिग्री सेलिसियस , केलविन , फारेन हाइट में मापा जाता है ।
- तापमान गर्मी का प्रभाव है ।
- गर्मी से तापमान- – – – – – – – – – – –
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सूर्यातप को प्रभावित करने वाले कारक :
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- सूर्य की किरणों का झुकाव :- पृथ्वी का आकार गोलाकार होने के कारण सूर्य की किरणें पृथ्वी के धरातल पर पड़ते समय उनका झुकाव अलग – अलग होता है । लम्बवत् किरणें कम क्षेत्रफल पर गिरती है । इसलिए वह इस प्रदेश को अधिक गर्म करती हैं । जैसे – जैसे किरणों के झुकाव का कोण कम होता जाता है । वैसे – वैसे क्षेत्रफल बढ़ता है तथा वह भाग कम गर्म होता है ।
- सूर्यातप पर वायुमंडल का प्रभाव :- वायुमण्डल में मेघ , आर्द्रता तथा धूलकण आदि परिवर्तनशील दशाएँ सूर्य से आने वाले सूर्यातप को अवशोषित , परावर्तित तथा उसका प्रकीर्णन करती हैं । जिससे पृथ्वी पर पहुँचने वाले सूर्यातप में परिवर्तन आ जाता है ।
- स्थल एवं जल का प्रभाव :- सूर्य की किरणों के प्रभाव से स्थलीय धरातल शीघ्रता से और अधिक गर्म होते हैं जबकि जलीय धरातल धीरे – धीरे तथा कम गर्म होते हैं ।
- दिन की लम्बाई अथवा धूप की अवधि :- किसी स्थान पर प्राप्त सूर्यातप की मात्रा दिन की लम्बाई अथवा धूप की अवधि पर निर्भर करती है । ग्रीष्म ऋतु में दिन बड़े होते हैं और सूर्यातप अधिक प्राप्त होता है । इसके विपरीत , शीत ऋतु में दिन छोटे होते हैं और सूर्यातप कम प्राप्त होता है ।
- भूमि की ढाल :- सूर्याभिमुखी ढाल होने पर अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है । जबकि विपरीत ढाल होने पर कम सूर्यातप प्राप्त होता है ।
- सूर्य से पृथ्वी की दूरी :- 3 जनवरी को पृथ्वी सूर्य के सबसे करीब होती है जबकि 4 जुलाई को सबसे दूर । अतः सूर्यातप भी उसी तरह – – – – – – – – – – – –
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पृथ्वी के गर्म और ठंडा होने के तरीके :
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- चालन :- जब असमान ताप वाले दो पिण्ड एक दूसरे के संपर्क में आते हैं । गर्म पिंड से ठंडे पिंड की तरफ ऊर्जा का प्रवाह होता है जब तक कि दोनों पिंडों का तापमान बराबर न हो जाए ।
- संवहन :- संवहन प्रक्रिया द्वारा वायुमण्डल में क्रमशः लम्बवत् ऊष्मा का स्थानान्तरण होता है । यह प्रक्रिया गैसीय तथा तरल पदार्थों में होती है । यह प्रक्रिया ठोस पदार्थों में नहीं होती । किसी गैसीय या तरल पदार्थ के एक भाग से दूसरे भाग की ओर उसके अणुओं द्वारा ऊष्मा के संचार को संवहन कहते हैं ।
- अभिवहन :- इस प्रक्रिया में ऊष्मा का क्षैतिज दिशा में स्थानान्तरण होता है । मध्य अक्षांशों में होने वाली मौसम की भिन्नताएं अभिवहन के कारण होती है । वायु द्वारा संचालित समुद्री धाराएं भी ऊष्ण कटिबन्धों से ध्रुवीय क्षेत्रों में ऊष्मा का संचार करती है । यह प्रक्रिया ठोस ,- – – – – – – – – – – –
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पार्थिव विकिरण :
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- सौर विकिरण लघु तरंगों के रूप में पृथ्वी की सतह को गर्म करता है । पृथ्वी स्वंय गर्म होने के बाद वायुमंडल में दीर्घ तरंगों के रूप में ऊर्जा का विकिरण करने लगती है । जिसे – – – – – – – – – – – –
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पार्थिव विकिरण किस तरह लाभदायक है ?
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- यही प्रक्रिया वायुमंडल को गर्म करती है । वायुमण्डलीय गैसें ( ग्रीन हाउस गैसे ) दीर्घ तरंगों को सोख लेती हैं और वायुमंडल अप्रत्यक्ष रूप से गर्म हो जाता है । तत्पश्चात धीरे – धीरे इस ताप को अंतरिक्ष में संचरित कर दिया जाता है । पृथ्वी रात के समय ठंडी हो जाती है अगर आसमान – – – – – – – – – – – –
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पृथ्वी के धरातल पर तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक :
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- उष्मा किसी पदार्थ के कणों में अणुओं की गति को दर्शाती है , वही तापमान किसी पदार्थ या स्थान के गर्म या ठण्डा होने को दर्शाता है जिसे डिग्री में मापते हैं । किसी भी स्थान पर वायु का तापमान निम्नलिखित कारकों द्वारा प्रभावित होता है :
- अक्षांश ( Latitude ) :- किसी भी स्थान का तापमान उस स्थान द्वारा प्राप्त सूर्यातप पर निर्भर करता है । सूर्यातप की मात्रा में अक्षांश के अनुसार भिन्नता पाई जाती है ।
- उत्तुंगता या ऊँचाई ( Altitude ) :- वायुमण्डल पार्थिव विकिरण के द्वारा नीचे से ऊपर की ओर गर्म होता है । यही कारण है कि समुद्र तल के पास के स्थानों पर तापमान अधिक तथा ऊँचे भाग में स्थित स्थानों पर तापमान कम होता है ।
- समुद्र से दूरी ( Distance from sea ) :- किसी भी स्थान के तापमान को प्रभावित करने वाला दूसरा महत्वपूर्ण कारक समुद्र से उस स्थान की दूरी है । स्थल की अपेक्षा समुद्र धीरे – धीरे गर्म और धीरे – धीरे ठण्डा होता है । समुद्र के निकट स्थित क्षेत्रों पर समुद्र एंव स्थल समीर का सामान्य प्रभाव पड़ता है ।
- वायुसंहति या वायु राशि तथा महासागरीय धाराएं ( Air Masses & Oceanic Currents ) :- वायु राशि भी तापमान को प्रभावित करती है । कोष्ण वायु सहतियों से प्रभावित होने वाले स्थानों का तापमान अधिक तथा ठंडी वायु संहतियों से प्रभावित स्थानों का तापमान कम होता है । इसी प्रकार महासागरीय धाराओं का प्रभाव भी – – – – – – – – – – – –
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तापमान का व्युत्क्रमण ( Temperature Inversion ) :
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- वायुमण्डल की सबसे निचली परत क्षोभमण्डल जो पृथ्वी के धरातल से सटी हुई है , में ऊचाई के साथ सामान्य परिस्थितियों में तापमान – घटता है । परन्तु कुछ विशेष परिस्थितियों में ऊचाई के साथ तापमान घटने के स्थान पर बढ़ता है । ऊंचाई के साथ तापमान के बढ़ने को व्युत्क्रमण कहते हैं । स्पष्ट है कि तापमान के प्रतिलोमन में धरातल के समीप ठंडी वायु तथा ऊपर की और- – – – – – – – – – – –
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व्युत्क्रमण के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ :
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तापमान के व्युत्क्रमण के लिए निम्नलिखित भौगोलिक परिस्थितियाँ सहयोगी होती हैं :-
- लम्बी रातें :- पृथ्वी दिन के समय ताप ग्रहण करती है तथा रात के समय ताप छोड़ती है । रात्रि के समय ताप छोड़ने से पृथ्वी ठण्डी हो जाती है । और पृथ्वी के आस – पास की वायु भी ठण्डी हो जाती है तथा उसके ऊपर की वायु अपेक्षाकृत गर्म होती है ।
- स्वच्छ आकाश :- भौमिक विकिरण द्वारा पृथ्वी के ठण्डा होने के लिए स्वच्छ अथवा मेघरहित आकाश का होना अति आवश्यक है , मेघ , विकिरण में बाधा डालते हैं तथा पृथ्वी एवं उसके साथ लगने वाली वायु को ठण्डा होने से रोकते हैं ।
- शान्त वायु :- वायु के चलने से निकटवर्ती क्षेत्रों के बीच ऊष्मा का आदान प्रदान होता है । जिससे नीचे की वायु ठण्डी नहीं हो पाती और तापमान का व्युत्क्रमण नहीं हो पाता ।
- शुष्क वायु :- शुष्क वायु में ऊष्मा को ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है । जिससे तापमान की हास दर में कोई परिवर्तन नहीं होता । परन्तु शुष्क वायु भौमिक विकिरण को शोषित नहीं कर सकती । अतः ठण्डी होकर तापमान के व्युत्क्रमण की स्थिति पैदा करती है ।
- हिमाच्छादन :- हिम , सौर विकिरण के अधिकांश भाग को परावर्तित कर देती है । जिससे वायु की निचली परत ठंडी रहती है और तापमान का व्युत्क्रमण होता है । क्षेत्रों में साल भर – – – – – – –
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तापमान के सामान्य हास दर :
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- ऊँचाई बढ़ने के साथ – साथ तापमान कम होता चला जाता है । 1000 मी . की ऊँचाई पर तापमान में 6.5 ° डिग्री सेल्सियस की कमी हो जाती हैं । इसे ही तापमान की सामान्य – – – – – – – – – – –
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पृथ्वी के ऊष्मा बजट का वर्णन विस्तार पूर्वक :
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वायुमंडल की ऊपरी सतह को 100 इकाई सूर्यातप प्राप्त होता है । इसका विवरण इस प्रकार है :-
- सूर्यातप का विकिरण :- सौर विकिरण की परावर्तित मात्रा को एल्बिड़ा ( Albedo ) कहा जाता है ।
- 1 . 16 % धूल कण और वाष्प कणों द्वारा अवशोषित होता है ।
- 2. 3 % बादलों द्वारा अवशोषित होता है ।
- 3. 6 % वायु द्वारा परावर्तित हो जाता है ।
- 4. 20 % बादलों द्वारा परावर्तित हो जाता है ।
- 5. 4 % जल और स्थल द्वारा परावर्तित हो जाता है ।
- 6. 51 % सूर्यातप पृथ्वी पर जल और स्थल द्वारा – – – – – – – – – – –
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33 + 16 = 49 इकाईयाँ
- पार्थिव विकिरण :- 51 % इकाइयों में से
- 1. 17 % इकाईयाँ सीधे अंतरिक्ष में चली जाती हैं ।
- 2. 6 % वायुमंडल द्वारा अवशोषित होती हैं ।
- 3. 9 % संवहन के जरिए अवशोषित होता है ।
- 4. 19 % संघनन की – – – – – – – – – – – –
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17 + 6 + 9 + 19 =51 इकाईयाँ
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जुलाई तथा जनवरी की समताप रेखाओं की विशेषताएं
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1. जनवरी :-
- जनवरी में समताप रेखाएं महासागरों में उत्तर तथा महाद्वीपों पर दक्षिण की ओर झुक जाती हैं । जनवरी का माध्य मासिक तापमान विषुवत रेखीय महासागरों पर 27 ° C से ज्यादा होता है , उष्ण कटिबंधों में 24 ° C से ज्यादा , मध्य अक्षांशों पर 20 ° C से 0 ° डिग्री सेल्सियस एंव यूरेशिया के आंतरिक भाग में -18 ° सेल्सियस से -48 ° सेल्सियस तक अंकित किया जाता है ।
- दक्षिणी गोलार्द्ध में तापमान भिन्नता कम होती है क्योंकि वहाँ जल भाग ज्यादा है इसलिए समताप रेखाएँ लगभग अक्षांशों के – – – – –
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2. जुलाई :-
- इस मौसम में समताप रेखाएँ उष्ण कटिबंध में 30 ° सेल्सियस से अधिक के कोष्ठ का निर्माण महाद्वीपों के भीतर करती है । यहाँ 40 ° उत्तरी तथा दक्षिणी अंक्षाशों पर 10 ° सेल्सियस की समताप रेखाएँ देखी जाती हैं । दक्षिणी गोलार्द्ध की समताप रेखाएँ उत्तर की अपेक्षा ज्यादा सरल व सीधी देखी जाती हैं ।
- जुलाई में समताप रेखाएं महाद्वीपों पर प्रवेश करते हुए उत्तर की ओर तथा महासागरों में प्रवेश करते हुए – – – – – – – – – – – –
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साइबेरिया के मैदान में वार्षिक तापांतर सर्वाधिक होता है । क्यों ?
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- कोष्ण महासागरीय धारा गल्फ स्ट्रीम उत्तर की ओर मुड़ जाती है तथा उन क्षेत्रों के तापमान को बढ़ा देती है । तथा उत्तरी अटलांटिका ड्रिफ्ट की मौजूदगी से उत्तरी अटलांटिका सागर ज्यादा गर्म होता है तथा सतह के ऊपर तापमान – – – – – – – – – –
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दक्षिणी गोलार्ध में तापमान पर महासागरों :
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- यहाँ समताप रेखाएं लगभग अक्षांशों के समांतर चलती है ।
- इन रेखाओं में उत्तरी गोलार्ध की अपेक्षा भिन्नता कम तीव्र होती है ।
- 20 ° से . , 10 ° से . एवं 0 से . की समताप रेखाएं क्रमशः 35 ° द . , 45 ° द . तथा 60 ° दक्षिण के – – – – – – – – – – – –
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